शुक्रवार, 22 जून 2012

पैगाम



मुद्दतों रही साथ मिरे पर मिली नहीं कभी,
दिल्लगी बड़ी जालिम, किताबों में दबी रही.

हर्फ़-हर्फ़ सजाया था जिसे कसीदाकारी से,
सफ़ेद सफ़हे की इबारत मटमैली सी मिली.

वो दर्द वो जूनून, मयस्सर नहीं आजकल,
अपनी बयानबाजियां, बस तंज ही लगीं .

पैगाम वही ताजा जो महफूज रहें जेहन में,
दिल तलक न पहुंचे दर्द तो कब्र भली सही. 

इंसान हुआ नादान तो परेशां फिरे हर वक्त,
मौसमों के आने-जाने में कोई दर्द कम नहीं.

-नवनीत नीरव-

3 टिप्‍पणियां:

Swarda saxena ने कहा…

Beautifully writtn poem.. Jivan ke behad karib lgi.. Cngrts navneet

Shilpa Shree ने कहा…

waha.....

Shilpa Shree ने कहा…

तुम कमाल करते हो. शब्दों के साथ क्या खूब खेलते हो. ..लिखते रहो