
हवा को मालूम है उसे कहाँ जाना है,
संग कितने सूखे पत्ते उड़ाना है,
जिंदगी में कुछ कदम सादगी से रख,
कितने पल रुकेगा इसका क्या ठिकाना है ।
समन्दर से लौटती उन कश्तियों को,
नीडों में लौटते उन पंक्षियों को ,
ख़बर है समन्दर और आसमां की,
गहराई में पलता भयानक वीराना है ।
आपदाओं की मार से सहमे घरों में,
दुबकी हुई निरीह मानवता को ,
अपने कम्बल की छाया दे दो तो,
ढलती शामों का वही आशियाना है ।
सड़कों पर चल लेकिन संभल के,
तेरे अपनों में कुछ वहां हाथ पसारते,
मुट्ठी भर चावल औ एक अदद रोटी ही,
समाज का करता बंटवारा है ।
-नवनीत नीरव -