रविवार, 19 अप्रैल 2009

पुरानी कविता

जिंदगी के गुजरे पलों को याद करना,
मानों हो किसी पुरानी कविता को दुहराना,
जो मन के अन्दर ,
किसी कोने में दबी हुई थी ,
लाइब्रेरी में पड़ी पुरानी किताबों जैसी ,
धूल की मोटी परतों से ढंकी,
गुप-चुप सी, अलग- थलग, खामोश- सी,
संवेदनाओं को सीने में दबाये,
और आज अचानक ही ,
अंतर्मन की भावनाओं संग ,
जेहन में उभर आई है
पन्ने भले ही उमर दराज हों ,
पर शब्द कहाँ पुराने होते हैं

जिसे सुना था मैंने ,
अपने पापा से ,
किसी खास मौके पर ,
जो समय के साथ शायद,
मैं भूल चला हूँ

जिसे पढ़ा था मैंने ,
पुराने अख़बार की कतरन पर ,
या फिर मूंगफली के ठोंगे पर ,
जिसकी सोंधी -सी महक,
अभी साँसों में भर आई है

जिसे कंठस्थ कर पाया था,
टीचर की डांट खाकर ,
और कितने ही ,
प्रयासों के बाद ,
अपने कोर्स की किताबों से

या कभी सुना था ,
सुदूर से आती स्वरलहरियों संग ,
किसी लोक गायक की आवाज में ,
नींद से बोझिल थीं पलकें उस वक्त ,
पर कुछ पंक्तियाँ अभी भी जीवंत हैं

-नवनीत नीरव -

6 टिप्‍पणियां:

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत बढिया रचना है।बधाई स्वीकारें।

जिंदगी के गुजरे पलों को याद करना,
मानों हो किसी पुरानी कविता को दुहराना,
जो मन के अन्दर ,
किसी कोने में दबी हुई थी ,

Swati ने कहा…

Nice ......

Priya ने कहा…

lajawaab! beete dino ki yaadein.. bilkul sachchi .... han aisa hi hota hain

GIRISH CHANDRA SHUKLA ने कहा…

aap bahut aacha likhte hai........aap ko bahut bahut badhai......कौन है राम, में रहीम न जानू , मेहमान बुलाया करते है
राह कौन सी मंजिल कैसी, हर राह सजाया करते है

रुकी साँस जो बाकि है, भगवन बुलाया करते है
ख़त्म हो गई सांसे अब तो, कफन सजाया करते है

जलाने में चिरागों को उँगलियाँ भी जल जाया करते हैं
मौसम बहारों की आने में, बस्ती भी उजड़ जाया करते हैं

Harkirat Haqeer ने कहा…

नवनीत जी.
अच्छे शब्दों का संयोजन , भाव भी अच्छे हैं , आपकी शब्दों पर पकड़ अच्छी है... अगली बार आपसे और बेहतर की उम्मीद है .....!!

Mai Aur Mera Saya ने कहा…

kaya likha hai apne panne sahi me umradaraz ho sakte hai par shabd nahi hote ... bahut khub ....