शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

दर्द

पहाड़ों का दर्द कहाँ ठहरता है ,
वह तो उन्मुक्त झरनों संग बहता है

गम कितने ही गहराई में छिपे हों दिल के ,
आंसू का एक कतरा ही उन्हें कम करता है

यूँ कभी ऐसा होता नहीं, जिंदगी गम में जले ,
गम तो अंधेरों में जुगनू सा जलता-बुझता है।

फासले-दरम्यान कैसे भी हों दिलों के ,
स्नेह का एक धागा उन्हें जोड़ सकता है

अक्सर स्याह रातों में भटकता है मेरा मन ,
पर एक तीली का प्रकाश मार्ग लक्षित करता है

- नवनीत नीरव -

1 टिप्पणी:

rahul ने कहा…

bahut achchhi panktiyan hai ye .
bahut goodh arth chhipa hai inmein.
Dhanayawad.