बुधवार, 1 अप्रैल 2009

अंदाजे -बयां

(मेरी एक दोस्त हैं दिल्ली सेनई-नई दोस्ती हुई है हमारीकवितायें लिखती हैंवह एक ही बात लिखती हैं कि- उनकी कविता पर मैं अपने विचार दूँअक्सर जब मैं दे नहीं पाता, तो वे दोस्ती तोड़ने की बात करती हैंयह कविता उन्हीं के लिए है। )

अपने होठों से कैसे तुम्हारा अंदाजे बयां कर दूँ ,
मन के अहसासों को ख़ुद से जुदा कर दूँ ।।

शोर करना तो झरने की फितरत है ,
कैसे समंदर के जज्बात मैं जग -जहाँ कर दूँ ।।

नर्म अल्फाज , भली बातें मुहज्जब लहजे ,
जो छलते हैं क्यों उसे मैं अदा कर दूँ ।।

ख्याली तितलियाँ जो इतरा रही हैं फूलों के रंग पे ,
हलकी बारिश से क्यों हर रंग मैं हल्का कर दूँ ।।

हर शाख भुला देती है पत्तों को पतझड़ में,
कैसे बचपन के यार को मैं नाआशना कह दूँ । ।

-नवनीत नीरव-

9 टिप्‍पणियां:

freespaceofindia ने कहा…

mast hai prabhu

Reecha Sharma ने कहा…

bahut hi sundar vichar, isiliye humara aabhar.

Reecha Sharma ने कहा…

behetreen aur evergreen kavita

Reecha Sharma ने कहा…

aise hi humesha humaare liye likhte rahe

Reecha Sharma ने कहा…

shukriya navnit aapne jo kuch bhi likha mere liye vo taaumar mere sar maathe par rahega. humari dosti ko shabdo mein pirokar tumne use amar kar diya hai. main rahu na rahu dosti humesha kaayam rahegi

sujata ने कहा…

Thank you for your comments Nirav, will read your poetry and comment soon, thanks once again

sujata ने कहा…

went thru your blog..great going navnit..amazing thoughts and very simply and lyrically stated..keep it up!!

shama ने कहा…

Bohot sundar...! Aurbhi padhnaa chahti hun...filhal ispe comment deke aage padh loongee..
Anek shubhkamnayen...

seema gupta ने कहा…

नर्म अल्फाज , भली बातें मुहज्जब लहजे ,
जो छलते हैं क्यों उसे मैं अदा कर दूँ ।।
" और ये छलावा ही दिल को कभी कभी सुकून भी तो दे जाता है न ..."

Regards