सोमवार, 30 मार्च 2009

घड़े कुम्हार के

बड़े यत्न से मिट्टी लाकर,
कुम्हार
बनाये एक घड़ा
यूँ तो सधे हाथों से ,
वह
घड़े बनाये सुंदर -सुन्दर,
पर कभी -कभी वो सुन्दर घड़े,
टेढे- मेढ़े हो जाते हैं
तीक्ष्ण
धूप में अधिक सूखकर,
दरारें
भी पड़ जाती हैं,
या
फिर आँवे में धूम- आंच संग,
काले
-
काले हो जाते हैं
इतने
पर भी खड़े हो हाट में ,
वो
तोल मोल कर बोले बोल ,
कभी
नहीं कहता है वह,
इस
घड़े में मेरे कोई ऐब है
पर क्या हम भी इसी तरह,
अपनों की तारीफ करते हैं ?
या
उनकी खुशी चाहते हैं ,
जब
हमारे रिश्तों में भी
दरारें
पड़ जाती हैं ....... ।
-
नवनीत नीरव-


1 टिप्पणी:

Madhaw Tiwari ने कहा…
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