मंगलवार, 22 मई 2012

वह रोती है ..






वह रोती है,
चुप- सी रातों में,
उत्सव की शुरुआत में,
अपनी बेटी की खुशी में,
उसके चले जाने के गम में,
वही बेटी,
जिसकी सुध उसने कभी न ली.

लेती भी भला कैसे?
वह तो परेशान रही,
अब तक,
अपने पति, अपने परिवार से,
जो  उसका न था,
न जाने जिसने क्यों,
उसका परित्याग किया हुआ है.

सहसा चिल्लाते हुए कुछ कहती है-
सबने मुझे दबाया है,
मुझे बोलने भी न दिया,
फिर वही लोग ,
अब चाहते है मुझसे,
मेरी बेटी को भी छीनना.

फिर वह खामोश हो जाती है,
आख़िरकार चुप ही तो रही है वो ,
इतनी परेशानियों के बाद भी,
जो आज तक रोयी नहीं थी,
फिर  न जाने आज क्यों,
वह रोती है.......

-नवनीत नीरव-





3 टिप्‍पणियां:

परमजीत सिहँ बाली ने कहा…

अपने मनोभावों को बहुत सुन्दर शब्द दिए हैं बधाई।

Swati Dey ने कहा…

Amazing............

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...