रविवार, 30 अगस्त 2009

दादाजी

चांदनी रात में,
जब बरसात होती है,
उस समय,
वह स्याह रात भी,
कुछ खास होती है,
खिड़की में खड़े होकर,
आकाश की ओर देखता हूँ,
चंदा की रोशनी संग,
झरती हुई बूंदों को,
निर्मल चाँदनी में,
चमकती हुई बूंदों को,
लगता है आसमान में रहने वाले,
अनगिनत तारे टूटकर,
आज धरती पर आ रहे हैं।

न जाने कितनी देर तक खड़ा रहता हूँ,
इस इंतजार में
यही सोचते,
शायद इन तारों संग,
मेरे दादू भी आते हों,
जिन्हें मिल नहीं पाया मैं,
आजतक अपने बचपन से

-नवनीत नीरव-

9 टिप्‍पणियां:

M VERMA ने कहा…

एहसास की सुन्दर कविता

ओम आर्य ने कहा…

एक मासूम एहसास की कविता.......बहुत ही सुन्दर बधाई

Priya ने कहा…

aapki kalam ne kaam karna shuru kar diya hai........ rang aane lage hai inme.....bahut achchi lagi

niv ने कहा…

jo chale jate hai kabhi lot kar nhi aate .......... mere bachche b apne dadu n dadi ma ko yu hi yaad karte hai ............. .ek massom ehsas ..................awesome

Harkirat Haqeer ने कहा…

नवनीत जी अच्छा लिखने लगे हैं आप .....और ये दादाजी की याद में लिखना ...बहुत कम लोग बड़ों को इतना सम्मान दे पते हैं .....!!

raj ने कहा…

aapki kavita bahut achhi lagi....

गर्दूं-गाफिल ने कहा…

तुम्हारा प्यार शब्दों से झरने सा बह रहा है
यु ही बहते रहो गीत कहते रहो
बधाई और शुभकामनाएं

एंजेला एणिमा...एंजेलिना जॉली ने कहा…

भावुकता की साफ अभिव्यक्ति...

vandana ने कहा…

sach maniye navneet ji apki rachna ne bhavuk kar diya ....mujhe mere dadaji ki yaad aa gayee ....kyoki main unse ese vakt me door aa gayee hoon jab umar ke is dor me unse bichadne ka dar satata rehta hai ......nic poetry