मंगलवार, 7 जुलाई 2009

परदेशी

सावन में इस बार,
फिर से झमका पानी,
याद आ गई उस,
नवयवना की कहानी,
पूरे सावन बैठ झूले पर,
कजरी गाती रहती ,
परदेशी पिया की याद में ,
अक्सर खोयी रहती,
इस आशा में शायद,
परदेशी लौट आए,
फिर से उसका यह सावन
हरा भरा हो जाये।

- नवनीत नीरव -

5 टिप्‍पणियां:

नीरज गोस्वामी ने कहा…

सांस है तो आस है...बहुत सुन्दर रचना...बधाई...
नीरज

Priya ने कहा…

CHOTI PAR DAMDAAR KAVITA

ओम आर्य ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यकति

Poonam Agrawal ने कहा…

Aashavadi rachanaa ....sunder aur choti si......badhai

vandana ने कहा…

sunder rachna