(कई बार हम मानव कुछ ख्वाब बुनते हैं....सच्चे ख्वाब। सच्चे इसलिए क्योंकि हम उन्हें पूरा करने की हर सम्भव कोशिश करते हैं । पर कई बार ऐसा होता है कि हम जो बात सोचते हैं उसे पूरा करने में काफी वक्त लग जाता है। कई बार विपरीत परिस्थितियों का सामना भी करना पड़ता है...खास कर युवा वर्ग को। ये कविता मैंने युवा मन और उनकी सोच को ध्यान में रखकर लिखी है .......)
भागते रास्तों में बिछड़ने का डर है,
क्या कहूं ?मुझे ख़ुद ही भटकने का डर है ।
सुबह से शाम तक संग चलता रहा,
अजनबी दोस्तों से मिलता चला ,
कई दास्ताँ समेटे अपनी आंखों में,
जीवन के रंगों को पढ़ता हुआ।
चल रहा मैं मंजिलों की खोज में,
बेदर्द मौसम की तपिश भूल के,
तंग टेढ़ी गलियों में घिसटता हुआ,
अनमने ढंग से आगे बढ़ता हुआ,
ख़ुद के भीड़ का अंश बनने का डर है,
क्या कहूं ?मुझे ख़ुद ही भटकने का डर है ।
सोचता हूँ कहीं पल भर ठहरूं,
यहाँ तो दम लेने की फुरसत नहीं,
समय की कीलें भागती हैं हमें,
जिंदगी इतनी तेज भाग सकती नहीं ,
बहुत से पल जिए हैं जिंदगी के,
उमंगों में ख़ुद को डुबोते हुए,
भागते रंगीन तितलियों के पीछे,
वक़्त को अपने पीछे छोड़ते हुए,
अब तो समय बीतने का डर है,
क्या कहूं ?मुझे ख़ुद ही भटकने का डर है ।
-नवनीत नीरव-
शनिवार, 30 मई 2009
गुरुवार, 28 मई 2009
भारतवासी....
(एक कविता देश के निवसियों के नाम, जो मैंने २००५ में लिखी थी.....)
टेढी मेढ़ी पगडण्डी पर,
हवाएं दौड़ा करती हैं,
पहाड़ों के सीने से लिपट कर,
घटाएं बरसा करती करती हैं,
रंग -बिरंगे पंछियों के,
जहाँ कलरव गूंजा करते हैं ,
होली के रंगों सी बोली,
सबके मन को छूती है,
भाषाएँ मीठी हैं चाहे,
मलयालम हो या पंजाबी,
गुजराती हो या संथाल,
सभी हैं भारतवासी। ।
जीवन के दो रूप यहाँ पर,
युवा शहर और प्रौढ़ गाँव,
भावुकता पहचान यहाँ की,
जैसे पेड़ों की ठंढी छाँव,
राग द्वेष की विभीषिकाओं से,
जो अभी तक है अनजान ,
एकता है सप्तरीषियों सी,
जो हमें बनाये विश्व पटल की शान।
रिश्ते शोभित हैं जैसे मौसम,
फसलें उगती जिनमें मनभावन,
वर्तमान है सुखंद यहाँ का,
और इतिहास है गौरवशाली,
गुजराती हो या संथाल,
सभी हैं भारतवासी । ।
-नवनीत नीरव -
टेढी मेढ़ी पगडण्डी पर,
हवाएं दौड़ा करती हैं,
पहाड़ों के सीने से लिपट कर,
घटाएं बरसा करती करती हैं,
रंग -बिरंगे पंछियों के,
जहाँ कलरव गूंजा करते हैं ,
होली के रंगों सी बोली,
सबके मन को छूती है,
भाषाएँ मीठी हैं चाहे,
मलयालम हो या पंजाबी,
गुजराती हो या संथाल,
सभी हैं भारतवासी। ।
जीवन के दो रूप यहाँ पर,
युवा शहर और प्रौढ़ गाँव,
भावुकता पहचान यहाँ की,
जैसे पेड़ों की ठंढी छाँव,
राग द्वेष की विभीषिकाओं से,
जो अभी तक है अनजान ,
एकता है सप्तरीषियों सी,
जो हमें बनाये विश्व पटल की शान।
रिश्ते शोभित हैं जैसे मौसम,
फसलें उगती जिनमें मनभावन,
वर्तमान है सुखंद यहाँ का,
और इतिहास है गौरवशाली,
गुजराती हो या संथाल,
सभी हैं भारतवासी । ।
-नवनीत नीरव -
लेबल:
प्रौढ़ गाँव,
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युवा शहर,
रंग,
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सप्त्रिशियों
शनिवार, 23 मई 2009
अपने......
(मैंने अपने सीनियर्स के फेयरवेल पर कुछ पन्तियाँ लिखीं थीं जो आज मैं आपके लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ।)
चल, चल के देख लें उनको,
अभी जो अपने थे।
सुबह गुलाबी धूप से,
रातों में,
आंखों के सपने थे।
माना सफर नहीं था,
मीलों का ,
माना कोई शिकारा न था,
झीलों का।
चंद लम्हों का यह सफर,
बना गए यादगार,
कुछ आगे बढ़ने की सीख,
कुछ आपके विचार ।
तुम्हीं से रोशन थी सारी फिजां,
खुशी से चहकती थी हर दिशा,
अब तो यही लगता है ,
खुशियाँ घर छोड़ चलीं,
अब तो यही लगता है ,
गलियां भी मुँह मोड़ चलीं।
रह गए यहाँ पर,
कुछ बिखरे सामान,
तुम, तुम्हारी यादें और ,
सूना ये जहाँ ।।
- नवनीत नीरव -
चल, चल के देख लें उनको,
अभी जो अपने थे।
सुबह गुलाबी धूप से,
रातों में,
आंखों के सपने थे।
माना सफर नहीं था,
मीलों का ,
माना कोई शिकारा न था,
झीलों का।
चंद लम्हों का यह सफर,
बना गए यादगार,
कुछ आगे बढ़ने की सीख,
कुछ आपके विचार ।
तुम्हीं से रोशन थी सारी फिजां,
खुशी से चहकती थी हर दिशा,
अब तो यही लगता है ,
खुशियाँ घर छोड़ चलीं,
अब तो यही लगता है ,
गलियां भी मुँह मोड़ चलीं।
रह गए यहाँ पर,
कुछ बिखरे सामान,
तुम, तुम्हारी यादें और ,
सूना ये जहाँ ।।
- नवनीत नीरव -
सोमवार, 18 मई 2009
चाहत पंछी की

बागों में विचारना हमारी चाहत नहीं ,
समंदर की लहरों 'औ' अनजानी राहों पर,
सबको गीत सुनाना हमारी चाहत नहीं।
हमारी चाहत तो है बस एक ही,
शाम ढले नीड़ों में लौटने की,
जहाँ की हर खुशियाँ समेटे हुए,
चुग्गा और दानों की तलाश कर,
जहाँ बच्चे इंतजार करते हमारा,
प्यार की चाहत में चोंच खोल कर।
-नवनीत नीरव-
शनिवार, 16 मई 2009
पुरानी प्रेमिका
अक्सर देखा है मैंने,
पेड़ से पत्तों को अलग होते हुए ,
हर साल पतझड़ में।
हर बार वो टूटते हैं,
फिर नए पत्ते जुड़ते हैं,
यह सिलसिला हर साल,
दुहराया जाता है।
पर उन पत्तों का क्या?
जो टूट कर बिखर जाते हैं,
जैसे वास्ता ही नहीं रहा हो ,
कभी एक दूसरे से ।
आत्मीय रिश्ते,
जब टूटते हैं ,
तो वे अक्सर ही,संवादहीन हो जाते हैं।
मुस्कुराना एक दूसरे के लिए,
जैसे कठिन हो जाता है,
और नजरें छिपते हुए,
गुजरना चाहती हैं।
एक अर्सा बीत गया,
साथ छूटे अपनी प्रेमिका का,
पर अब भी जब वो,
मेरे सामने आती है,
एक नजर देखती है मुझे,
धीमे से मुस्कुराती है
और फिर
हौले से गुजर जाती है।
-नवनीत नीरव-
पेड़ से पत्तों को अलग होते हुए ,
हर साल पतझड़ में।
हर बार वो टूटते हैं,
फिर नए पत्ते जुड़ते हैं,
यह सिलसिला हर साल,
दुहराया जाता है।
पर उन पत्तों का क्या?
जो टूट कर बिखर जाते हैं,
जैसे वास्ता ही नहीं रहा हो ,
कभी एक दूसरे से ।
आत्मीय रिश्ते,
जब टूटते हैं ,
तो वे अक्सर ही,संवादहीन हो जाते हैं।
मुस्कुराना एक दूसरे के लिए,
जैसे कठिन हो जाता है,
और नजरें छिपते हुए,
गुजरना चाहती हैं।
एक अर्सा बीत गया,
साथ छूटे अपनी प्रेमिका का,
पर अब भी जब वो,
मेरे सामने आती है,
एक नजर देखती है मुझे,
धीमे से मुस्कुराती है
और फिर
हौले से गुजर जाती है।
-नवनीत नीरव-
गुरुवार, 14 मई 2009
तपिश

लम्हों की बात करुँ तो,
ये पल में गुजर जाते हैं,
कैद करुँ मुट्ठी में तो,
रेत से फिसल जाते हैं।
सफर की बात करुँ तो,
कई हसीन चेहरे मिल जाते है,
दिल चाहे गर रोकना तो,
सुनहरी यादें छोड़ जाते हैं। मौसमों की बात करुँ तो,
कई रंग निखर आते हैं,
चटकी हुई हर कली के रंग,जेहन में उतर आते हैं।
बचपन की बात करुँ तो,
बाहें फैलाये बच्चे बुलाते हैं,
उनींदी यादों के उड़नखटोले पर,
मुझे मेरे गाँव ले जाते हैं । बीतीं बातें गर याद करुँ तो,
गुजरे पल किस्से सुनाते हैं,
वर्त्तमान की तपिश कम कर,
माँ के आँचल-सी छाँव दे जाते हैं।
-नवनीत नीरव-
मंगलवार, 12 मई 2009
पानी की खोज में .....

(गर्मी अपने चरम पर है। सारे ताल -तलैया सूख चुके हैं । सबसे ज्यादा परेशानी उन महिलाओं को होती है जिन्हें अपने घर से दूर किसी ताल या कुएं से पानी लाना पड़ता है । ऐसी ही एक स्त्री है जो पानी लाने के लिए गाँव से दूर किसी तालाब पर जा रही है।)
सिर पर लिए छूछी गगरिया,
संग सहेलियां औ उनकी अठखेलियाँ,
चली जा रही मैं ,
दूर किसी ताल की तरफ,
पानी की खोज में ।
तीक्ष्ण धूप से तन हुए श्यामल,
बदरंगी हुई जाती है,
मोरी चुनरिया,
कोई उन कारे मेघों से कह दे,
बरसो कभी तो म्हारो गाँव।
तुम्हरी बिजुरियों को छीन के,
बाँधूंगी अपनी चढ़ती उमरिया,
जो ढलती जा रही है,
दिनभर भटकते हुए,
पानी की खोज में .... ।
-नवनीत नीरव-
सोमवार, 11 मई 2009
साँझ ढले गाँव में .....
(मुझे याद है गर्मियों की छुट्टियों में हमें पापा गाँव ले जाते थे । गाँव जाकर मुझे बिल्कुल नयापन महसूस होता था। कुछ चीज़ें गाँव के बारे में, मैं जानता जरूर था पर यह तस्वीर गर्मियों की छुट्टियों में कुछ ज्यादा स्पष्ट हो जाती थी।कुछ बातें जिन्हें मैं अक्सर सोचा करता था, उसे मैंने कविता का रूप देने की कोशिश की है ।)
साँझ की चादर फैलते ही ,
तारे मुस्कुराने लगते हैं अक्सर,जब कोई बाला संझवत दिखा जाती है,
या दरवाजे पर लालटेन लटका जाती है ,
जो पुरवाई संग हिलती रहती है ,
मानों किसी बच्चे का पालना हो।
दालान सुबह से ही तैयार बैठी है ,
हर आगंतुक का नाम पता पूछती हुई,
शाम ढले जमने वाली महफ़िल के इंतजार में ,
जो अब ठहाके लगा रही है ,
दुनिया भर की खबरें सुन ,
महफ़िल जमे या न जमे,
लालटेन तो जलती रहेगी यथाशक्ति,
यह बताते हुए गाँव जग रहा है ।
उपलों का धुआं हर कमरे के मन में ,
रच -बस सा गया है ,
रोटियों की खुशबू के क्या कहने ?
वो तो जैसे अंतरात्मा को छू जाती है,
और जो अंतरात्मा को छू जाए,
क्या आप उसे भुला सकते हैं भला ?
न जाने कितने चक्कर बनते हैं,
एक लैंप के चारों तरफ बच्चों के,
सारा गाँव मानों प्रतिबद्ध है ,
नौनिहालों के भविष्य के लिए,
अधखुली उनींदी आंखों की कोशिश जारी है
कल्पनाओं में हकीक़त का रंग भरने के लिए ।
सांझ ढले गाँव में,
एक तैयारी चलती रहती है,
एक सुखद भारत के निर्माण की,
दूर शहरों के कोलाहल से,
योजनाबद्ध तरीके से, गुपचुप से,
वह दिन ज्यादा दूर नहीं,
जब सुदूर अन्तरिक्ष से कोई हमें पुकारेगा,
हमें हमारे भारत का नाम ले के ।
हमें हमारे भारत का नाम ले के ।
-नवनीत नीरव -
साँझ की चादर फैलते ही ,
तारे मुस्कुराने लगते हैं अक्सर,जब कोई बाला संझवत दिखा जाती है,
या दरवाजे पर लालटेन लटका जाती है ,
जो पुरवाई संग हिलती रहती है ,
मानों किसी बच्चे का पालना हो।
दालान सुबह से ही तैयार बैठी है ,
हर आगंतुक का नाम पता पूछती हुई,
शाम ढले जमने वाली महफ़िल के इंतजार में ,
जो अब ठहाके लगा रही है ,
दुनिया भर की खबरें सुन ,
महफ़िल जमे या न जमे,
लालटेन तो जलती रहेगी यथाशक्ति,
यह बताते हुए गाँव जग रहा है ।
उपलों का धुआं हर कमरे के मन में ,
रच -बस सा गया है ,
रोटियों की खुशबू के क्या कहने ?
वो तो जैसे अंतरात्मा को छू जाती है,
और जो अंतरात्मा को छू जाए,
क्या आप उसे भुला सकते हैं भला ?
न जाने कितने चक्कर बनते हैं,
एक लैंप के चारों तरफ बच्चों के,
सारा गाँव मानों प्रतिबद्ध है ,
नौनिहालों के भविष्य के लिए,
अधखुली उनींदी आंखों की कोशिश जारी है
कल्पनाओं में हकीक़त का रंग भरने के लिए ।
सांझ ढले गाँव में,
एक तैयारी चलती रहती है,
एक सुखद भारत के निर्माण की,
दूर शहरों के कोलाहल से,
योजनाबद्ध तरीके से, गुपचुप से,
वह दिन ज्यादा दूर नहीं,
जब सुदूर अन्तरिक्ष से कोई हमें पुकारेगा,
हमें हमारे भारत का नाम ले के ।
हमें हमारे भारत का नाम ले के ।
-नवनीत नीरव -
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