शनिवार, 1 जून 2013

इश्तिहार जिदगी...

उत्पाद बने हम,
इश्तिहार जिदगी,
बाजारों के बाज़ार से,
गुजर रही जिंदगी.

श्वेत-श्याम बॉक्स से,
रंगीन मुखपृष्ठ तक,
रोड के डिवाइडर से,
ट्रैफिक और सिग्नल्स तक,
बड़े-बड़े होल्डिंग्स में,
हाइवे और बिल्डिंग्स पर,
मॉलों के स्टैच्यूज़ से,
गिफ्ट कूपन टैटू पर,
सचिन के बैट से,
शारापोवा के पैंट तक,
बहुरंगी ख्यालों में यूँ ही कभी-कभी,
खो जाती है जिंदगी .
उत्पाद बने हम,
इश्तिहार जिदगी........

नदी में, पहाड़ों पर,
टी-स्टाल, ढाबों पर,
चोंगे में, भोंपू पर,
ट्रैक्टर में, टेम्पो पर,
ट्रांजिस्टर में, एफ़० एम० पर,
थियेटर में, नुक्कड़ पर,
मेलों में, मंडी पर,
हरे-भरे खेतों की पगडंडी पर,
मंदिर, गिरजा, मज़ारों पर,
रेलवे लाइन्स की दीवारों पर,
और न जाने कहाँ-किस मोड़ पर
खुद को ख़रीदती-बेचती जिंदगी.
उत्पाद बने हम,
इश्तिहार जिदगी.........


-नवनीत नीरव-

3 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सटीक बात कही है ..॥ ज़िंदगी भी बजारवाद से जुड़ गयी है ।

expression ने कहा…

बिकने को तैयार मगर खरीदार नहीं....
लाचार ज़िन्दगी.....


अनु

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

आज की ब्लॉग बुलेटिन शो-मैन तू अमर रहे... ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !