गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

सप्ताहांत पर एक बूढ़ा जादूगर


परेशां फिरता है हर शख्स ,
आम दिन की आवाजाही में,
हर सुबह से गहरे शाम तक,
जोड़ता, सहेजता, जमा करता है.
कुछ अरमां, चंद ख्वाब,
जिनमें से ज्यादातर अधूरे ही रह जाते हैं
एक कसक दिल में रह जाती है
और वह हफ्ता बीत जाता है.

सप्ताहांत बहुत अहम होता है,
उदासी और हताशा से उबरने को,
बीते हफ्ते का लेखा जोखा दुःख दर्द,
सबका हिसाब किताब करने को  
मन की टूट-फूट, गिले शिकवे दूर कर,
घर पड़ोस से मिलने-जुलने को,
अपनों का अपनापन और एक स्पर्श,
स्नेह का आवरण गाढ़ा कर जाता है

उन दिनों देर शाम बड़ी ही अच्छी कद-काठी का,
आकर्षक वेशभूषा और साफ जबान का
एक बूढ़ा जादूगर आता है,
बड़े सलीके से प्यार भरे लहजे में
पूरी दुनिया-जहाँ की बात करता है,
सबको करोड़पति बनने के सपने दिखा कर  
अधूरे ख्वाब मूर्त करने की चाह
पुनर्जीवित कर जाता है.

-नवनीत नीरव- 

3 टिप्‍पणियां:

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

KBC के लिए बहुत बढिया कविता

रश्मि प्रभा... ने कहा…

http://urvija.parikalpnaa.com/2012/12/blog-post_3097.html

expression ने कहा…

बहुत सुन्दर...

अनु