शनिवार, 29 मई 2010

कुछ पंक्तियाँ पर्चियों से.....

(आजकल समय का अभाव सा हो गया है। पंक्तियाँ मन में जरूर आती हैं लेकिन विस्तार नहीं ले पायीं। कुछ कागजों पर, डायरी के पीछे, पर्स में रखे कार्ड्स पर। उनमें से कुछ आपके लिए बिना किसी संशोधन के । )

हकीकत की ऐसी दुनिया रचें,

परदेशियों को लगे वो अपना शहर,

जैसे बस के सफर में कोई अजनबी,

सो जाये आपके कंधे पर सर रख कर।

बड़े अरमानों से दिल में संजोये सपने,

अक्सर टूट जाया करते हैं,

जैसे सफर में मिले हरदिल अजीज मुसाफिर,

मुकाम से पहले ही छूट जाया करते हैं

यह जीवन है जैसे एक बस की सवारी,

मंजिल तक पहुंचते ही, उतरें सब बारी –बारी।

दो पहियों पर जैसे एक सायकिल चलती है,

जीवन गाड़ी उन्हीं सुख -दुःख के पहियों पर फिसलती है।

घनघोर बारिश में, हरी भरी घाटियों से

कभी बस से गुजरें तो लगता है,

हरे चादर में सिमटी वादियों को देखकर,

मन कहता है स्वर्ग तो यहीं है ।

जरूरत नहीं होती है ,

हर अहसास जताने की,

पन्नों पर लिखकर ,

कुछ खास बनने की,

अमिट बनाना है तो ,

बसा लो अपने मन में,

गर आदतें बन जायेंगी वैसी ,

जरूरत न होगी याद दिलाने की।

सावन अब जा रहा है ,

अनुभवों को समेटकर कहते हुए ,

रिश्ते ठीक रहे तो ,

अगले साल आएगा मिलने फिर से।

इन घनी बस्तियों में कोई अपना -सा है,

कभी उससे मुलाकात हो यह सपना -सा है,

कुछ घरों में अभी रौशनी सी है,

दीवारें खुरदरी हैं मगर फर्श चिकना सा है।

खूबसूरत शहर जहाँ तुने मुझसे दगा किया,

न वो तेरा था न मेरा अपना था,

अब तो हकीकत की इतनी मजाल कहाँ,

जो भी था एक बुरा सपना था।

१०

रस्ते जहाँ हम संभल कर चलते हैं,

नजरें संभलती हैं तो कदम संभलते हैं,

जब से एक शख्श से नजरें चार हुई हैं,

तब से न हम संभले हैं न वो ही संभले हैं।

११

वो अमलतास जहाँ तुने मुस्कुरा कर पलकें उठाई थीं,

फूलों की ही नहीं पत्तों की भी जान निकल आई थी,

तब से फूल खुद को सँवारने में लगे हैं,

उस जगह आजकल अब पत्ते भी कम गिरते हैं।

१२

आसमानी आसमां पर प्यार से धरती ने,

कुछ सफ़ेद से बादल बना डाले,

तब से अक्सर रोता है आसमां,

क्यों तूने ये राज सभी को बता डाले?

१३

आजकल दुनिया में गम बढ़ गए हैं,

आँखें टी वी सीरियलों को देखकर भी छलक जाती है,

उन बेमौसमी बादलों को देखकर,

दिनभर थके पति की भूख मर जाती है।

१४

हमें तो सच बोलने की कीमत चुकानी पड़ती है,

अहसास न होने तक मैं सच बोलता गया,

हमने ये सफर एक साथ शुरू किया था मगर,

तुम आगे निकल गए मैं वहीँ का वहीँ रह गया।

१५

दिल की अदला –बदली में देखें क्या हो जाता है,

कल तक जो वो अपना था अब दूजे संग इतराता है,

कोई पूछे इस दिल से उस दिल की हालत क्या होगी ?

मेरे हॉस्टल का एक कमरा जो रातों को जग जाता है ।

१६

वो चाँद को तकते-तकते, बादल बरस जाता है,
सीने पर रखा तकिया, हर रोज गीला कर जाता है,
हो दिल खाली तो भर देती हैं आँखें उसे .

१७

कुछ हसरतें दबाई थी हमने न जाने कब से , यूँ बेरुखी से उन्हें जुदा न करो,
गर आप कहें तो हम सपने भी न देखें, यूँ सरे आम हमको रुसवा तो न करो.

- नवनीत नीरव-







3 टिप्‍पणियां:

Shekhar Kumawat ने कहा…

अरे वाह जी बहुत सुंदर

धन्यवाद

Udan Tashtari ने कहा…

यूँ ही बहने दिजिये इन प्रवाहों को...

जैसे बस के सफर में कोई अजनबी,
सो जाये आपके कंधे पर सर रख कर।

-वाह! बहुत उम्दा!

vandana ने कहा…

navneet ji ...behad behad khoobsoorat panktiyaa or shabi appne aapp me poorn bhi ..mushkil hai kehna k kon si tahreer jyada pasand aayi :)