सोमवार, 11 मई 2009

माँ

तुम हो जीवन की बगिया में,
ममता की अमृत धारा,
सींच रही हो वर्षों से ,
यह बगिया, घर आँगन सारा

हर सुबह-सुबह देखा तुमको,
किरणों के संग जगते ही,
कई काम लिए अपने हाथों में,
बिना थके हुए करते ही
झाडू के संग सफाई हो,
या फुलवारी की निराई ,
हर जरूरतें से पूरीं करती जातीं,
हमने जो आवाज लगाई

अब इतनी दूर चला आया हूँ ,
मन खाली- खाली सा लगता है ,
जिम्मेदारियां इतनी आन पड़ी ,
हर काम सवाली लगता है,
कैसे इनको पूरा कर लूँ ?
यह गुत्थी उलझती जाती है ,
अक्सर बेबस हो जाने पर माँ,
याद तुम्हारी आती है

प्रबंधन की पढाई से मैं,
सीख रहा
काम धीरे -धीरे,
तुमने कहाँ से सीखा इसे?
यह बात है मेरी समझ से परे,
कोशिश यही करता हूँ मैं,
तरीके तुम्हारे अपनाऊं,
हो सकता है तुम्हारी प्रेरणा से
मैं ,
एक सफल मैनेजर बन जाऊं

-नवनीत नीरव-

7 टिप्‍पणियां:

MANVINDER BHIMBER ने कहा…

किसी ने यूँ ही नहीं कहा है ....मांवां ठंडियाँ छांवां ....बहुत अच्छी post है

vandana ने कहा…

bahut sunder post hai ...maa ka viyakhyan jitna karen kam hi reh jata hai ...par apka prays behad khoobsoorat hai ..bhagvan ham sab par maa ka ashirvad hamesha banaye rakhe ....

Udan Tashtari ने कहा…

बिल्कुल सही है..माँ की प्रेरणा और आशीर्वाद से ही सफल बनोगे चाहे जो भी बन जाओ.

सुन्दर रचना.

अनिल कान्त : ने कहा…

माँ के आशीर्वाद से सब कुछ संभव है ..
अच्छी लगी आपकी रचना

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

Priya ने कहा…

bahut khoob......maa itni achchi kyon hoti hain.... shayad isliye kyoki wo maa hoti hain

कौतुक रमण ने कहा…

सही कहा, एक माँ मैनेजमेंट के बहुत से गुर जानती है. एक दिन घर संभालना मुश्किल है हमारे लिए, टु डू लिस्ट बनायें तो दिमाग घूम जायेगा.

राकेश ने कहा…

मां पर कविता कभी नीरस नही होतीं, कभी पुरानी नही पड़ती, कभी अप्रासंगिक नही होती...अच्छी अभिव्यक्ति है, भाव पसंद आए।

कभी समय मिले तो माँ पर मेरी काव्य अभिव्यक्ति पढ़ियेगा और बताईयेगा की कैसी लगी...



http://kavisparsh.blogspot.com/2009/05/blog-post_18.html