
कुम्हार बनाये एक घड़ा ।
यूँ तो सधे हाथों से ,
वह घड़े बनाये सुंदर -सुन्दर,
पर कभी -कभी वो सुन्दर घड़े,
टेढे- मेढ़े हो जाते हैं।
तीक्ष्ण धूप में अधिक सूखकर,
दरारें भी पड़ जाती हैं,
या फिर आँवे में धूम- आंच संग,
काले- काले हो जाते हैं ।
इतने पर भी खड़े हो हाट में ,
वो तोल मोल कर बोले बोल ,
कभी नहीं कहता है वह,
इस घड़े में मेरे कोई ऐब है।
पर क्या हम भी इसी तरह,
अपनों की तारीफ करते हैं ?
या उनकी खुशी चाहते हैं ,
जब हमारे रिश्तों में भी
दरारें पड़ जाती हैं ....... ।
-नवनीत नीरव-